ब्रह्म कमल पौधा

ब्रह्म कमल (BRAHMA KAMAL) के पौधे में 1 साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि शुभ रात्रि में ही खिलता है और सफेद , महरुन, एवं लाल रंग का होता है | जो देखने में आकर्षक होता है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह सृष्टि के रचयिता ब्रम्हा जी का कमल है | इसीलिए इसे ब्रह्मकमल के नाम से जाना जाता है | आपको इस अत्यंत दुर्लभ चमत्कारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले फूल के रहस्य और प्रचलित मान्यताओं के बारे में जान कर बहुत प्रसन्ता होगी जिससे आप आज तक अनजान थे |

ब्रह्मकमल कमल की अन्य प्रजातियों के विपरीत पानी में नहीं वरन धरती पर खिलता है। सामान्य तौर पर ब्रह्मकमल हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। इसकी सुंदरता तथा दैवीय गुणों से प्रभावित हो कर ब्रह्मकमल को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है।
भारत के अन्य भागों में इसे और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसै – हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस। साल में एक बार खिलने वाले गुल बकावली को भी कई बार भ्रमवश ब्रह्मकमल मान लिया जाता है।माना जाता है कि ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है। इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था।पिघलते हिमनद और उष्ण होती जलवायु के कारण इस दैवीय पुष्प पर संकट के बादल पहले ही गहरा रहे थे। भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं द्वारा केदारनाथ में ब्रह्मकमल का अंधाधुँध दोहन भी इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। इसी तरह हेमकुण्ट साहिब यात्रा में भी ब्रह्मकमल को नोचने का रिवाज-सा बन गया है। पूजा-पाठ के उपयोग में आने वाला औषधीय गुणों से युक्त यह दुर्लभ पुष्प तीर्थयात्रीयों द्वारा अत्यधिक दोहन से लुप्त होने की कगार पर ही पहुँच गया है।

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