29Nov

पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान

पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान
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क्या कोई ऐसा भी वृक्ष है,जिसं छूने मात्र से मनुष्य
की थकान मिट जाती है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक
वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसको छूने से देव नर्तकी
उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम
के इस वृक्ष के फूलो को देव मुनि नारद ने श्री कृश्ण
की पत्नी सत्यभामा को दिया था। इन अदभूत फूलों
को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर
बैठी कि परिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी
वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष के
बारे में श्रीमदभगवत गीता में भी उल्लेख मिलता है।
श्रीमदभगवत गीता जिसमें 12 स्कन्ध,350 अध्याय
व18000 ष्लोक है ,के दशम स्कन्ध के 59वें अध्याय के 39
वें श्लोक , चोदितो भर्गयोत्पाटय पारिजातं
गरूत्मति। आरोप्य सेन्द्रान विबुधान निर्जत्योपानयत
पुरम॥ में पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण
नरकवधों नामक अध्याय में की गई है।
सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण
ने परिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग
लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को
ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया।
जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर
स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात प्राप्त
कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर
सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। जैसा
कि श्रीमदभगवत गीता के श्लोक, स्थापित
सत्यभामाया गृह उधान उपषोभन । अन्वगु•र्ा्रमरा
स्वर्गात तद गन्धासलम्पटा, से भी स्पष्ट है। भगवान
श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था
सत्यभामा की वाटिका में परन्तु उसके फूल उनकी
दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में गिरते थे। लेकिन
श्री कृष्ण के हमले व पारिजात छीन लेने से रूष्ट हुए
इन्द्र ने श्री कृश्ण व पारिजात दोनों को शाप दे
दिया था । उन्होन् श्री क्रष्ण को शाप दिया कि
इस कृत्य के कारण श्री कृष्ण को पुर्नजन्म यानि
भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाएगा।
जबकि पारिजात को कभी न फल आने का शाप
दिया गया। तभी से कहा जाता है कि पारिजात
हमेशा के लिए अपने फल से वंचित हो गया। एक
मान्यता यह भी है कि पारिजात नाम की एक
राजकुमारी हुआ करती थी ,जिसे भगवान सूर्य से
प्यार हो गया था, लेकिन अथक प्रयास करने पर भी
भगवान सूर्य ने पारिजात के प्यार कों स्वीकार नहीं
किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात
ने आत्म हत्या कर ली थी। जिस स्थान पर पारिजात
की कब्र बनी वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म
लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने
से ऐसा लगता है जैसे वह रो रहा हो, लेकिन सूर्य उदय
के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को
आगोष में लेने को आतुर दिखाई पडते है। ज्योतिश
विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया
गया है।
पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल
राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न
करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है।
उन्होने बताया कि यदि ,ओम नमो मणि़•ाद्राय
आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली
हयौं मणि भद्राय नम, मन्त्र का जाप 108 बार करते
हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाए
और पूजा के इस नारियल व फूलो को लाल कपडे में
लपेटकर घर के पूजा धर में स्थापित किया जाए तो
लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास
करती है। यह पूजा साल के पांच मुहर्त
होली,दीवाली,ग्रहण,रवि पुष्प तथा गुरू पुष्प नक्षत्र
में की जाए तो उत्तम है। यहां यह भी बता दे कि
पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते
है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है। यानि वृक्ष से फूल
तोड़ने की पूरी तरह मनाही है।
इसी पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके
रूड़की के कुंवर हरि सिंह यादव ने बताया कि यंू तो
परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई
जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष
आज भी उ.प्र. के बाराबंकी जनपद अंतर्गत रामनगर
क्ष्ोत्र के गांव बोरोलिया में मौजूद है। लगभग 50
फीट तने व 45 फीट उंचाई के इस वृक्ष की ज्यादातर
शाखाएं भूमि की ओर मुड़ जाती है और धरती को छुते
ही सूख जाती है।
एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग
के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ
खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है।
आयु की दृष्टि से एक हजार से पांच हजार वर्ष तक
जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री
एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं। जिसकी दुनियाभर
में सिर्फ 5 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से एक
डिजाहाट है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट
प्रजाति का है। कुंवर हरि सिंह यादव अपने षोध
आधार पर बताते है कि एक मान्यता के अनुसार
परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी ।
जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। कहा
जाता है जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ
अज्ञातवास पर थे तब उन्होने ही सत्यभामा की
वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गांव में
रोपित कर दिया होगा। तभी से परिजात गांव
बोरोलिया की शोभा बना हुआ है। देशभर से
श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के लिए और मनौती
मांगने के लिए परिजात वृक्ष की पूजा अर्चना करते
है। पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है।
पारिजात बावासीर रोग निदान के लिए रामबाण
औषधी है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन
किया जाये तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है।
पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से
बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है।
पारिजात के फूल हदय के लिए भी उत्तम औषधी माने
जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर
यदि इन फूलों का या फिर फूलो के रस का सेवन
किया जाए तो हदय रोग से बचा जा सकता है।
इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर
शहद में मिलाकर सेवन करने से सुखी खासी ठीक हो
जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को
पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो
जाते है। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का
भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।
पारिजात की कोंपल को अगर 5 काली मिर्च के
साथ महिलाएं सेवन करे तो महिलाओं को स्त्री रोग
में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जंहा हेयर
टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस
क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। इस दृश्टि से
पारिजात अपनेआपमें एक संपूर्ण औषधी भी है।
इस वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व व दुर्लभता को देखते हुए
जंहा परिजात वृक्ष को सरकार ने संरक्षित वृक्ष
घोषित किया हुआ है। वहीं देहरादून के राष्ट्रीय वन
अनुसंधान संस्थान की पहल पर पारिजात वृक्ष के आस
पास छायादार वृक्षों को हटवाकर पारिजात वृक्ष
की सुरक्षा की गई। वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक
डा. एसएस नेगी का कहना है कि पारिजात वृक्ष से
चंूकि जन आस्था जुडी है। इस कारण इस वृक्ष को
संरक्षण दिये जाने की निरंतर आवश्यकता है। इस वृक्ष
की एक विषेशता यह भी है कि इस वृक्ष की कलम
नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की
श्रेणी में आता है। भारत सरकार ने पारिजात वृक्ष पर
डाक टिकट भी जारी किया। ताकि अर्न्तराष्ट्रीय
स्तर पर पारिजात वृक्ष की पहचान बन सके।
सायटिका में लाभदायक पारिजात
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हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष
होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके
फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया
जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।
परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30
फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर
पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर
मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में
ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और
सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा
जाते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात,
शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात।
मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली-
शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै।
तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम –
पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात।
उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन-
निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।
गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-
कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय
और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने
का इसमें विशेष गुण है।
रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता
है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य
ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित
ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से
12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है।
पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक
ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल
(1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया
जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो
क्षाराभ होते हैं।
उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से
उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग
गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया
जाता है।
गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम
पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी
लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें,
पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में
घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज
सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।
ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से
चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा
होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना
अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें
कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग
वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।