लक्ष्मी कमल का पौधा घर में लगाना काफी अच्छा माना जाता है। यह पौधा घर के लोगों में खुशियां और सौहार्द बढ़ाता है,और घर मे संपन्नता लाता है। लक्ष्मी कमल और विष्णु कमल के पौधे की खासियत है कि इस लगाने से घर के लोगों मे पहले की तुलना में पॉज़िटिव परिवर्तन आता है ।

कई बार आपको दरिद्रता के साथ-साथ आपके घर में आर्थिक तंगी का सामना करना पडा है तो वास्तुदोष भी हो सकता है। घर में होने वाली छोटी-छोटी बातें धन के नुकसान का कारण बनती हैं । देखें कहीं आपके घर में तो ऐसा नहीं हो रहा ।

यह बहुत ही चमत्कारी पौधा है इस पौधे को घर में विधि विधान के साथ लगाने में आपको निश्चित ही विशेष फल प्राप्त होगा जो आपकी धन के कारण होने वाले रुकावट को दूर करेगा और आप के लिए धन प्राप्ति के नए आयाम खोलेगा | यदि आपके घर में पैसा नहीं रुकता तो वह भी रुकने लगेगा ।इस पौधे को लगाने के कुछ समय बाद ही आपको यह महसूस होगा कि आपके घर में पैसे का आना शुरू हो गया और धन प्राप्ति के नए-नए मार्ग प्रशस्त होना शुरू हो जाएगे।

इसलिए इस पौधे को अपने घर के पूजा स्थान या मेडिटेशन वाले कमरे में लगाना चाहिए। या फिर आपका घर मे अगर गार्डन है तो वहा अन्य पोधों के साथ  भी लगा सकते है ।

घर में धन के भंडार भरे रहें और संचय भी हो इसके लिए अपनी तिजोरी अथवा धन रखने वाले स्थान का मुंह उत्तर दिशा की ओर रखें। और यधि पास संभब हो तो इसके पास लक्ष्मी कमल का पोधा जरूर रखे। इससे लक्ष्मीजी हमेशा प्रशन्न रहती है। क्योंकि लक्ष्मी जी का प्रिय पोधा और फूल कमल है। इसीलिए उनको पद्मासनी कहा जाता है । लक्ष्मी जी कमल पर बिराजमान होती है

*आर्थिक समस्याओं से छुटकारा हेतु
*ग्रह दोष दूर करने हेतु
*व्यापार में वृद्धि हेतु
*वास्तु शांति के लिये
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चित्रकूट ,
दीपावली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। मां लक्ष्मी की पूजा तो हर कोई करता है लाई-बताशा, मिठाई सहित कई तरह की सामग्री अर्पित कर पूजा की जाती है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मां लक्ष्मी की पूजा में कमल का पुष्प होता है। बिना कमल के पुष्प के मां लक्ष्मी की पूजा अधूरी मानी जाती है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक मां लक्ष्मी जब उत्पन्न हुई थीं, तब कमल का पुष्प हाथों में रखे हुए थीं।
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद पंडित गजेंद्र कामर्थी शास्त्री ने बताया कि लक्ष्मी मां की पूजा का विधान सभी को पता है, लेकिन पुराणों के मुताबिक जब समुद्र मंथन हुआ तब मां लक्ष्मी समुद्र से उत्पन्न हुई थीं। उनके हाथों में कमल का फूल था। साथ ही वह कमल के फूल पर ही बैठी हुई थीं। इसलिए मां लक्ष्मी की पूजा में कमल के पुष्प को महत्वपूर्ण माना गया है। कमल का पुष्प कीचड़ में उत्पन्न होता है, लेकिन वह अपने सुंदरता के कारण अलग पहचान बनाए हुए है। उसी तरह मनुष्यों को भी इस कर्म भूमि में अच्छे कर्म करते हुए अपना स्थान प्रभु के हृदय में बनाने का प्रयास करना चाहिए।

हर बार करें मां लक्ष्मी को पुष्प अर्पित-

शास्त्री जी ने बताया कि आज के युग कमल का पुष्प प्रतिदिन मिल पाना संभव नहीं है , इसलिए शास्त्रों में वर्णन है कि लक्ष्मी कमल एवं विष्णु कमल के पौधे को लक्ष्मी जी के समक्ष रखने मात्र से कई हजारगुना फल प्राप्त होता है .

यह पौधा जो आप देख रहे हैं बहुत ही चमत्कारी पौधा है इस पौधे को घर में विधि विधान के साथ लगाने में आपको निश्चित ही विशेष फल प्राप्त होगा जो आपकी धन के कारण होने वाले रुकावट को दूर करेगा और आप के लिए धन प्राप्ति के नए आयाम खोलेगा | यदि आपके घर में पैसा नहीं रुकता तो वह भी रुकने लगेगा ।
इस पौधे को लगाने के कुछ समय बाद ही आपको यह महसूस होगा कि आपके घर में पैसे का आना शुरू हो गया और धन प्राप्ति के नए-नए मार्ग प्रशस्त होना शुरू हो जाएगे।

इस पौधे को लगाने से घर में वास्तु दोष दूर होता है यदि आप किसी के कोर्ट केस से परेशान हैं तो लक्ष्मी कमल के पौधे के साथ अपराजिता का पौधा जरूर लगाएं।

इस पौधे को उत्तर पूर्व दिशा यानी कि ईशान कोण में लगाएं या अपने पूजा स्थान के पास ही रखें कुछ ही दिनों में या पौधा असर दिखाना शुरू कर देगा यह पौधा धन ही प्रदान नहीं करता साथ ही घर में सुख शांति और समृद्धि को भी बरकरार रखता है ।

– वैसे तो मां लक्ष्मी को कमल के साथ ही गेंदा, मदार जैसे पुष्प अर्पित किए जा सकते हैं, लेकिन इन सब के साथ माता को कमल का पुष्प अवश्य अर्पित करना चाहिए। यदि कोई भी पुष्प नहीं है तो एेसे में सिर्फ कमल का पुष्प अर्पित करने मात्र से ही मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

शमी वृक्ष की महिमा🌺

🌺पौराणि‍क मान्यताओं के अनूसार शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है।
🌺घर में शमी का पेड़ लगाने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्ध‍ि आती है।
🌺शमी का वृक्ष, घर के ईशानकोण (पूर्व और उत्तर दिशा के कोण) में लगाना लाभकारी होता है।
🌺शमीवृक्ष, शनि ग्रह के प्रकोप से भी बचाता है। न्याय के देवता शनिदेव को खुश करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं, जिनमें शमी के पेड़ की पूजा भी शामिल है।
🌺शनिदेव की टेढ़ी नजर से रक्षा करने के लिए शमी के पौधे को घर में लगाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।
🌺नवग्रहों में शनि महाराज को न्यायाधीश का स्थान प्राप्त है, इसलिए जब शनि की दशा आती है, तब जातक को अच्छे-बुरे कर्मों का पूरा फल प्राप्त होता है।
यही कारण है कि शनि के प्रकोप से लोग भयभीत रहते है।

🌺पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष है जिन पर शनि का प्रभाव होता है.
🌺पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है, तथा वास्तु शास्त्र के अनूसार इसे घर में लगाना शुभ नहीं होता है, अतः घर मे शमी का वृक्ष लगाकर नियमित रूप से इसकी पूजा की जाए और इसके नीचे सरसों तेल का दीपक जलाया जाए, तो शनि ग्रह के कुप्रभाव से बचाव होता है।
🌺शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास होता है। सभी यज्ञों में शमी वृक्ष की समिधाओं का प्रयोग शुभ माना गया है।
🌺शमी के कांटों का प्रयोग तंत्र-मंत्र बाधा और नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए भी होता है।
🌺शमी के पंचांग, यानी फूल, पत्ते, जड़ें, टहनियां और रस का इस्तेमाल कर शनि संबंधी दोषों से जल्द मुक्ति पाई जा सकती है।
🌺शमी पत्र से भगवान शिव के पुजन का भी विधान है।

🌺पौराणि‍क मान्यता🌺
पौराणि‍क मान्यता है कि लंका पर विजयी पाने के बाद भगवान श्रीराम ने शमीवृक्ष का पूजन किया था। नवरात्री में माँ दुर्गा का पूजन शमी वृक्ष के पत्तों से करने का विधान है, गणेश जी और शनिदेव, दोनों को ही शमी पत्र बहुत प्रिय है!! -सुभाष बुड़ावन वाला,18,शांतीनाथ कार्नर,खाचरौद[म्प] !! -सुभाष बुड़ावन वाला

शमी वृक्ष की महिमा🌺

🌺पौराणि‍क मान्यताओं के अनूसार शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है।
🌺घर में शमी का पेड़ लगाने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्ध‍ि आती है।
🌺शमी का वृक्ष, घर के ईशानकोण (पूर्व और उत्तर दिशा के कोण) में लगाना लाभकारी होता है।
🌺शमीवृक्ष, शनि ग्रह के प्रकोप से भी बचाता है। न्याय के देवता शनिदेव को खुश करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं, जिनमें शमी के पेड़ की पूजा भी शामिल है।
🌺शनिदेव की टेढ़ी नजर से रक्षा करने के लिए शमी के पौधे को घर में लगाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।
🌺नवग्रहों में शनि महाराज को न्यायाधीश का स्थान प्राप्त है, इसलिए जब शनि की दशा आती है, तब जातक को अच्छे-बुरे कर्मों का पूरा फल प्राप्त होता है।
यही कारण है कि शनि के प्रकोप से लोग भयभीत रहते है।

🌺पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष है जिन पर शनि का प्रभाव होता है.
🌺पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है, तथा वास्तु शास्त्र के अनूसार इसे घर में लगाना शुभ नहीं होता है, अतः घर मे शमी का वृक्ष लगाकर नियमित रूप से इसकी पूजा की जाए और इसके नीचे सरसों तेल का दीपक जलाया जाए, तो शनि ग्रह के कुप्रभाव से बचाव होता है।
🌺शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास होता है। सभी यज्ञों में शमी वृक्ष की समिधाओं का प्रयोग शुभ माना गया है।
🌺शमी के कांटों का प्रयोग तंत्र-मंत्र बाधा और नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए भी होता है।
🌺शमी के पंचांग, यानी फूल, पत्ते, जड़ें, टहनियां और रस का इस्तेमाल कर शनि संबंधी दोषों से जल्द मुक्ति पाई जा सकती है।
🌺शमी पत्र से भगवान शिव के पुजन का भी विधान है।

🌺पौराणि‍क मान्यता🌺
पौराणि‍क मान्यता है कि लंका पर विजयी पाने के बाद भगवान श्रीराम ने शमीवृक्ष का पूजन किया था। नवरात्री में माँ दुर्गा का पूजन शमी वृक्ष के पत्तों से करने का विधान है, गणेश जी और शनिदेव, दोनों को ही शमी पत्र बहुत प्रिय है!! -सुभाष बुड़ावन वाला,18,शांतीनाथ कार्नर,खाचरौद[म्प] !! -सुभाष बुड़ावन वाला

पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान
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क्या कोई ऐसा भी वृक्ष है,जिसं छूने मात्र से मनुष्य
की थकान मिट जाती है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक
वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसको छूने से देव नर्तकी
उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम
के इस वृक्ष के फूलो को देव मुनि नारद ने श्री कृश्ण
की पत्नी सत्यभामा को दिया था। इन अदभूत फूलों
को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर
बैठी कि परिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी
वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष के
बारे में श्रीमदभगवत गीता में भी उल्लेख मिलता है।
श्रीमदभगवत गीता जिसमें 12 स्कन्ध,350 अध्याय
व18000 ष्लोक है ,के दशम स्कन्ध के 59वें अध्याय के 39
वें श्लोक , चोदितो भर्गयोत्पाटय पारिजातं
गरूत्मति। आरोप्य सेन्द्रान विबुधान निर्जत्योपानयत
पुरम॥ में पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण
नरकवधों नामक अध्याय में की गई है।
सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण
ने परिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग
लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को
ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया।
जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर
स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात प्राप्त
कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर
सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। जैसा
कि श्रीमदभगवत गीता के श्लोक, स्थापित
सत्यभामाया गृह उधान उपषोभन । अन्वगु•र्ा्रमरा
स्वर्गात तद गन्धासलम्पटा, से भी स्पष्ट है। भगवान
श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था
सत्यभामा की वाटिका में परन्तु उसके फूल उनकी
दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में गिरते थे। लेकिन
श्री कृष्ण के हमले व पारिजात छीन लेने से रूष्ट हुए
इन्द्र ने श्री कृश्ण व पारिजात दोनों को शाप दे
दिया था । उन्होन् श्री क्रष्ण को शाप दिया कि
इस कृत्य के कारण श्री कृष्ण को पुर्नजन्म यानि
भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाएगा।
जबकि पारिजात को कभी न फल आने का शाप
दिया गया। तभी से कहा जाता है कि पारिजात
हमेशा के लिए अपने फल से वंचित हो गया। एक
मान्यता यह भी है कि पारिजात नाम की एक
राजकुमारी हुआ करती थी ,जिसे भगवान सूर्य से
प्यार हो गया था, लेकिन अथक प्रयास करने पर भी
भगवान सूर्य ने पारिजात के प्यार कों स्वीकार नहीं
किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात
ने आत्म हत्या कर ली थी। जिस स्थान पर पारिजात
की कब्र बनी वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म
लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने
से ऐसा लगता है जैसे वह रो रहा हो, लेकिन सूर्य उदय
के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को
आगोष में लेने को आतुर दिखाई पडते है। ज्योतिश
विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया
गया है।
पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल
राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न
करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है।
उन्होने बताया कि यदि ,ओम नमो मणि़•ाद्राय
आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली
हयौं मणि भद्राय नम, मन्त्र का जाप 108 बार करते
हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाए
और पूजा के इस नारियल व फूलो को लाल कपडे में
लपेटकर घर के पूजा धर में स्थापित किया जाए तो
लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास
करती है। यह पूजा साल के पांच मुहर्त
होली,दीवाली,ग्रहण,रवि पुष्प तथा गुरू पुष्प नक्षत्र
में की जाए तो उत्तम है। यहां यह भी बता दे कि
पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते
है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है। यानि वृक्ष से फूल
तोड़ने की पूरी तरह मनाही है।
इसी पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके
रूड़की के कुंवर हरि सिंह यादव ने बताया कि यंू तो
परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई
जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष
आज भी उ.प्र. के बाराबंकी जनपद अंतर्गत रामनगर
क्ष्ोत्र के गांव बोरोलिया में मौजूद है। लगभग 50
फीट तने व 45 फीट उंचाई के इस वृक्ष की ज्यादातर
शाखाएं भूमि की ओर मुड़ जाती है और धरती को छुते
ही सूख जाती है।
एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग
के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ
खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है।
आयु की दृष्टि से एक हजार से पांच हजार वर्ष तक
जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री
एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं। जिसकी दुनियाभर
में सिर्फ 5 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से एक
डिजाहाट है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट
प्रजाति का है। कुंवर हरि सिंह यादव अपने षोध
आधार पर बताते है कि एक मान्यता के अनुसार
परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी ।
जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। कहा
जाता है जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ
अज्ञातवास पर थे तब उन्होने ही सत्यभामा की
वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गांव में
रोपित कर दिया होगा। तभी से परिजात गांव
बोरोलिया की शोभा बना हुआ है। देशभर से
श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के लिए और मनौती
मांगने के लिए परिजात वृक्ष की पूजा अर्चना करते
है। पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है।
पारिजात बावासीर रोग निदान के लिए रामबाण
औषधी है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन
किया जाये तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है।
पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से
बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है।
पारिजात के फूल हदय के लिए भी उत्तम औषधी माने
जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर
यदि इन फूलों का या फिर फूलो के रस का सेवन
किया जाए तो हदय रोग से बचा जा सकता है।
इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर
शहद में मिलाकर सेवन करने से सुखी खासी ठीक हो
जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को
पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो
जाते है। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का
भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।
पारिजात की कोंपल को अगर 5 काली मिर्च के
साथ महिलाएं सेवन करे तो महिलाओं को स्त्री रोग
में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जंहा हेयर
टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस
क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। इस दृश्टि से
पारिजात अपनेआपमें एक संपूर्ण औषधी भी है।
इस वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व व दुर्लभता को देखते हुए
जंहा परिजात वृक्ष को सरकार ने संरक्षित वृक्ष
घोषित किया हुआ है। वहीं देहरादून के राष्ट्रीय वन
अनुसंधान संस्थान की पहल पर पारिजात वृक्ष के आस
पास छायादार वृक्षों को हटवाकर पारिजात वृक्ष
की सुरक्षा की गई। वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक
डा. एसएस नेगी का कहना है कि पारिजात वृक्ष से
चंूकि जन आस्था जुडी है। इस कारण इस वृक्ष को
संरक्षण दिये जाने की निरंतर आवश्यकता है। इस वृक्ष
की एक विषेशता यह भी है कि इस वृक्ष की कलम
नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की
श्रेणी में आता है। भारत सरकार ने पारिजात वृक्ष पर
डाक टिकट भी जारी किया। ताकि अर्न्तराष्ट्रीय
स्तर पर पारिजात वृक्ष की पहचान बन सके।
सायटिका में लाभदायक पारिजात
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हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष
होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके
फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया
जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।
परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30
फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर
पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर
मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में
ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और
सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा
जाते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात,
शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात।
मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली-
शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै।
तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम –
पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात।
उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन-
निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।
गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-
कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय
और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने
का इसमें विशेष गुण है।
रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता
है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य
ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित
ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से
12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है।
पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक
ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल
(1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया
जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो
क्षाराभ होते हैं।
उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से
उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग
गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया
जाता है।
गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम
पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी
लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें,
पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में
घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज
सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।
ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से
चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा
होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना
अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें
कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग
वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।

PARIJAT /HARISHRINGAR पारिजात पौधा

ईश्वर के प्रिय हैं फूल

ईश्वर के प्रिय हैं फूल

ईश्वर की आराधना में फूलों का विशेष स्थान है। फूल, पवित्र और शुद्धता के प्रतीक माने जाते हैं इसलिए देवताओं को यह खूब भाते हैं। इस खूबसूरत दुनिया में रंग-बिरंगे अनेक फूल मौजूद हैं, जिनमें से एक है परिजात का फूल। परिजात का फूल देखने में अलौकिक प्रतीत होता है लेकिन इसके उद्भव से जुड़ी कहानी इससे भी कहीं ज्यादा अद्भुत है।

परिजात ट्री

परिजात ट्री

परिजात के वृक्ष की खासियत है कि जो भी इसे एक बार छू लेता है उसकी थकान चंद मिनटों में गायब हो जाती है। उसका शरीर पुन: स्फूर्ति प्राप्त कर लेता है। हरिवंशपुराण के अनुसार स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी परिजात के वृक्ष को छूकर ही अपनी थकान मिटाती थी।

दैवीय वृक्ष

दैवीय वृक्ष

परिजात के वृक्ष को दैवीय कहा जाता है, जिसमें साल में बस एक ही महीने में फूल खिलते हैं। गंगा दशहरा के आसपास यह पेड़ फूल खिलाता है लेकिन हैरानी की बात है जब पेड़ से फूल झड़ते हैं तो वे पेड़ के करीब नहीं, बहुत दूर जाकर गिरते हैं।

रुक्मिणी और कृष्ण की प्रेम कहानी

रुक्मिणी और कृष्ण की प्रेम कहानी

परिजात के फूलों का यह स्वभाव भगवान कृष्ण और रुक्मिणी की प्रेम कहानी और सत्यभामा की जलन से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार नारद ऋषि इन्द्रलोक से इस वृक्ष के कुछ फूल लेकर कृष्ण के पास गए।

नारद की चालाकी

नारद की चालाकी

कृष्ण ने ये फूल उनसे लेकर अपने निकट बैठी पत्नी रुक्मिणी को दे दिए। इस घटना के बाद नारद, कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा के पास गए और उनसे कहा कि परिजात के बेहद खूबसूरत फूल कृष्ण ने रुक्मिणी को सौंप दिए और उनके लिए एक भी नहीं रखा।

सत्यभामा की जलन

सत्यभामा की जलन

यह बात सुनकर सत्यभामा ईर्ष्या से भर गईं और कृष्ण से जिद करने लगीं कि उन्हें परिजात का दिव्य वृक्ष चाहिए। परिजात का वृक्ष देवलोक में था, इसलिए कृष्ण ने उनसे कहा कि वे इन्द्र से आग्रह कर वृक्ष उन्हें ला देंगे।

देवराज इन्द्र

देवराज इन्द्र

पति-पत्नी में झगड़ा लगाकर नारद, देवराज इन्द्र के पास गए और उनसे कहा कि मृत्युलोक से इस वृक्ष को ले जाने का षडयंत्र रचा जा रहा है लेकिन यह वृक्ष स्वर्ग की संपत्ति है, इसलिए यहीं रहना चाहिए।

इन्द्रलोक

इन्द्रलोक

इतने में ही कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ इन्द्रलोक आए। पहले तो इन्द्र ने यह वृक्ष सौंपने से मना कर दिया लेकिन अंतत: उन्हें यह वृक्ष देना ही पड़ा। जब कृष्ण परिजात का वृक्ष ले जा रहे थे तब देवराज इन्द्र ने वृक्ष को यह श्राप दे दिया कि इस पेड़ के फूल दिन में नहीं खिलेंगे।

कृष्ण की चालाकी

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कृष्ण की चालाकी

सत्यभामा की जिद की वजह से कृष्ण परिजात के पेड़ को धरती पर ले आए और सत्यभामा की वाटिका में लगा दिया। लेकिन सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए उन्होंने कुछ ऐसा किया कि वृक्ष लगा तो सत्यभामा की वाटिका में था लेकिन इसके फूल रुक्मिणी की वाटिका में गिरते थे।

परिजात वृक्ष से दूर

परिजात वृक्ष से दूर

इस तरह सत्यभामा को वृक्ष तो मिला लेकिन फूल रुक्मिणी को ही प्राप्त होते थे। यही वजह है कि परिजात के फूल, अपने वृक्ष से बहुत दूर जाकर गिरते हैं।

राजकुमारी का प्रेम

राजकुमारी का प्रेम

परिजात के विषय में एक अन्य मान्यता, परिजात नामक राजकुमारी से जुड़ी है जो सूर्य देव से बहुत प्रेम करती थी। अथक प्रयास और तप के बावजूद जब सूर्यदेव ने परिजात का प्रेम स्वीकार नहीं किया तब क्रोध में आकर परिजात ने आत्महत्या कर ली।

परिजात की कब्र

परिजात की समाधि

जिस स्थान पर परिजात की समाधि बनाई गई उस पर यह वृक्ष उग गया और तब से इस वृक्ष का नाम परिजात पड़ गया। शायद यही कारण है कि रात के समय इस वृक्ष को देखने से लगता है मानो यह रो रहा है और सूरज की रोशनी में खिलखिला उठता है।

सत्यभामा की वाटिका

सत्यभामा की वाटिका

एक अन्य कथा के अनुसार, अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव अपनी माता कुंती के साथ कहीं जा रहे थे। उस समय उन्होंने सत्यभामा की वाटिका में यह वृक्ष देखा। कुंती ने अपने पुत्रों से इस वृक्ष को बोरोलिया में लगाने को कहा।

परिजात ट्री थकान मिटाता है

परिजात ट्री थकान मिटाता है

तब से लेकर अब तक बाराबंकी का यह वृक्ष वहीं स्थित है। देशभर से लोग इस स्थान पर पूजा-अर्चना कर अपनी मन्नत मांगने और थकान मिटाने आते हैं।

रोचक वृक्ष

रोचक वृक्ष

बाराबंकी स्थित परिजात का पेड़ अपने आप में बहुत रोचक है। लगभग 50 फीट के तने व 45 फीट की ऊंचाई वाले इस वृक्ष की अधिकांश शाखाएं मुड़कर धरती को छूती हैं। यह पेड़ वर्ष में बस जून माह में फूल देता है।

वृक्ष की आयु

वृक्ष की आयु

अगर इस वृक्ष की उम्र की बात की जाए तो वैज्ञानिकों के अनुसार यह वृक्ष 1 हजार से 5 हजार साल तक जीवित रह सकता है। इस प्रकार की दुनिया में सिर्फ पांच प्रजातियां हैं, जिन्हें एडोसोनिया वर्ग में रखा जाता है। परिजात का पेड़ भी इन्हीं पांच प्रजातियों में से ‘डिजाहट’ प्रजाति का सदस्य है।

 

 

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लक्ष्मी के प्रिय

लक्ष्मी के प्रिय

धन की देवी को भी परिजात के फूल अत्याधिक प्रिय हैं इसलिए उनकी पूजा में परिजात के फूल जरूर अर्पण करने चाहिए।

SHAMI PLANT / शमी का पौधा

शमी के वृक्ष के ये महत्व जानकर हैरान रह जाएंगे आप

शमी के वृक्ष का महत्व

शमी के वृक्ष का महत्व

हिंदू सभ्यता में मान्यता है कि कुछ पेड़-पौधों को घर में लगाने या उनकी उपासना करने से घर में खुशहाली रहती है या घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहता है। पीपल, केला और शमी का वृक्ष आदि ऐसे पेड़ हैं जो घर में समृद्धि प्रदान करते हैं। इसी तरह मान्यता है कि शमी का पेड़ घर में लगाने से देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।

शनि के प्रकोप से बचाएगा शमी

शनि के प्रकोप से बचाएगा शमी

शमी के पेड़ की पूजा करने से घर में शनि का प्रकोप कम होता है। यूं तो शास्त्रों में शनि के प्रकोप को कम करने के लिए कई उपाय बताएं गए हैं। लेकिन इन सभी उपायों में से प्रमुख उपाय है शमी के पेड़ की पूजा। घर में शमी का पौधा लगाकर पूजा करने से आपके कामों में आने वाली रुकावट दूर होगी।

यज्ञ की वेदी के लिए पवित्र लकड़ी

यज्ञ की वेदी के लिए पवित्र लकड़ी

शमी वृक्ष की लकड़ी को यज्ञ की वेदी के लिए पवित्र माना जाता है। शनिवार को करने वाले यज्ञ में शमी की लकड़ी से बनी वेदी का विशेष महत्व है। एक मान्यता के अनुसार कवि कालिदास को शमी के वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

गजानन का प्रिय वृक्ष शमी

शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष माना जाता है। इसलिए भगवान गणेश की आराधना में शमी के वृक्ष की पत्तियों को अर्पित किया जाता है। भगवान गणेश की पूजा में प्रयोग की जाने वाली इस पेड़ की पत्तियों का आयुर्वेद में भी महत्व है। आयुर्वेद की नजर में शमी अत्यंत गुणकारी औषधि है। कई रोगों में इस वृक्ष के अंग काम लिए जाते हैं।

शमी के वृक्ष के दर्शन शुभ

उत्तर भारत के बिहार और झारखंड में सुबह के समय उठने के बाद शमी के वृक्ष के दर्शन को शुभ माना जाता है। बिहार और झारखंड में यह वृक्ष अधिकतर घरों के दरवाजे के बाहर लगा हुआ मिलता है। लोग किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन करते और इसे माथे से लगाते हैं, ऐसे करने से उन्हें उस काम में कामयाबी मिलती है।

कई दोषों का निवारण करता है शमी

शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास होता है। सभी यज्ञों में शमी वृक्ष का उपयोग शुभ माना गया है। शमी के कांटों का प्रयोग तंत्र-मंत्र बाधा और नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए होता है। शमी के पंचाग, यानी फूल, पत्तियों, जड़, टहनियों और रस का इस्तेमाल कर शनि संबंधी दोषों से मुक्ति पाई जा सकती है।

दशहरे में शमी का पूजन लाभकारी

दशहरे पर शमी के वृक्ष के पूजन का विशेष महत्व है। नवरात्र में भी शमी के वृक्ष की पत्तियों से पूजन करने का महत्व बताया गया है। नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन शाम के समय वृक्ष का पूजन करने से धन की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले शमी के वृक्ष के सम्मुख अपनी विजय के लिए प्रार्थना की थी।

दरवाजे की बायीं तरफ लगाएं पेड़

शमी की पूजा के साथ ही एक सवाल यह भी है कि इस पेड़ को घर में किस तरफ लगाना चाहिए। शमी के वृक्ष को घर के मुख्य दरवाजे के बांयी तरफ लगाएं। इसके बाद नियमित रूप से सरसों के तेल का दीपक जलाएं। आपके घर और परिवार के सभी सदस्यों पर सदैव शनि की कृपा बनी रहेगी।

पीपल का विकल्प शमी का वृक्ष

पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष हैं, जिन पर शनि का प्रभाव होता है। पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है, इसलिए इसे घर में लगाना संभव नहीं हो पाता। वास्तु शास्त्र के मुताबिक नियमित रूप से शमी की पूजा करने और उसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि दोष और उसके कुप्रभावों से बचा जा सकता है।

लक्ष्मी कमल एवं विष्णु कमल के पौधे का महत्व

 

लक्ष्मी कमल  का पौधा :  लक्ष्मी कमल  का पौधा घर में लगाना का काफी अच्छा होता है। यह पौधा घर के लोगों में खुशियां, सौहार्द बढ़ाता है। लक्ष्मी कमल  और विष्णु कमल के पौधे की खासियत है कि इस लगाने से घर के लोग पहले की तुलना में काफी शांत हो जाते हैं। इसलिए इस पौधे को अपने घर के पूजा  स्थान या  मेडिटेशन वाले कमरे में लगाना चाहिए। या फिर आपका घर मे अगर गार्डन है तो वहा भी लगा सकते है ।

 

आपको दरिद्रता के साथ-साथ आपके घर में आर्थिक तंगी का सामना करना पडा है तो वास्तुदोष भी हो सकता है। घर में होने वाली छोटी-छोटी बातें बनती हैं धन के नुकसान का कारण। देखें कहीं आपके घर में तो नहीं हो रही ये गलत बातें।

 

घर में धन के भंडार भरे रहें और संचय भी हो इसके लिए अपनी तिजोरी अथवा धन रखने वाले स्थान का मुंह उत्तर दिशा की ओर रखें। और यधि  पास संभब हो तो इसके पास लक्ष्मी कमल का पोधा जरूर रखे। इस्से लक्ष्मीजी हमेशा प्रशन्न रहती है।

कमल वनस्पति जगत का एक पौधा है जिसमें बड़े और ख़ूबसूरत फूल खिलते हैं

 

कमल वनस्पति जगत का एक पौधा है जिसमें बड़े और ख़ूबसूरत फूल खिलते हैं। यह भारत का सबसे प्रसिद्ध फूल है। संस्कृत में इसके नाम हैं – कमल, पद्म, पंकज, पंकरुह, सरसिज, सरोज, सरोरुह, सरसीरुह, जलज, जलजात, नीरज, वारिज, अंभोरुह, अंबुज, अंभोज, अब्ज, अरविंद, नलिन, उत्पल, पुडरीक, तामरस, इंदीवर, कुवलय, वनज आदि आदि। फारसी में कमल को ‘नीलोफ़र’ कहते हैं। और फारसी मे भी इसका बहुत महत्व है।

जाने माँ लक्ष्मी के सबसे प्रिय पौधों के बारें में

 

हम सभी लोग आर्थिक रूप से सम्पन्नता प्राप्त करना चाहता है। हर व्यक्ति चाहता है की वो अपने जीवन में इतना धन कमाए की उसकी सम्पूर्ण इच्छाएं पूर्ण हो जाये। हिन्दू धर्म में माँ लक्ष्मी को धन की देवी के रूप में जाना जाता है। आज हम आपको ऐसे दो पौधों के बारें में बताने जा रहें हैं जो की माँ लक्ष्मी के सबसे प्रिय पौधे है। अगर आप इन्हे अपने घर में लगा लें तो आपके घर में धन धान्य की कभी कमी नहीं आएगी।

माँ लक्ष्मी का सबसे प्रिय पौधा है लक्ष्मी कमल का पौधा और उसका कमल का फूल । लक्ष्मी कमल पौधा शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। कमल का पौधा घर में प्रविष्ट होने वाले रस्ते में लगाना चाहिए। माना जाता है की कमल का पौधा आत्मज्ञान और नैतिकता का वातावरण फैलता है।तथा इससे माँ लक्ष्मी की कृपा दृष्टि हमेशा बनी रहती है।

दूसरा पौधे का नाम है विष्णु कमल का पोधा एस पौधे को सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसको घर पर लगाने से घर के मुखिया की आमदनी में बढ़ोतरी होती है। इस पौधे को आप अपने घर के लिविंग रूम में लगा सकते हैं। इन दोनों पौधों को घर पर लगाने से आप पर माँ लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी और आप पर कभी भी आर्थिक संकट नहीं आएगा।

 

किस भगवान को कौन सा फूलचढ़ाने से मिलता है मनचाहा वरदान

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धर्म एवं श्रद्धा

‘आस्थावान’ शब्द का महत्व तब अधिक बढ़ जाता है, जब यह किसी धर्म के सम्बन्ध से बोला गया हो। कोई इंसान अपने धर्म को लेकर कितना ईमानदार है तथा उसके प्रति कितनी निष्ठा रखता है, इसे उस धर्म के प्रति निष्ठा की मात्रा से आंका जाता है। लेकिन मेरी राय में कोई कट्टर हो या ना हो, यदि वह दिल से भगवान को याद करता है तो उसकी मनोकामनाएं आवश्य पूर्ण होंगी।

2 पूजन

ऐसा कई लोग मानते हैं, परन्तु इस सोच के बावजूद भी लोग आस्था के नाम पर कई कार्य करते हैं। पूजा के लिए पूर्ण विधि-विधान का प्रयोग करना, पूजा सामग्री का सही मात्रा में इस्तेमाल करना तथा हर एक पूजा में खास प्रकार के फूलों को शामिल करना… यह काफी आम पाया गया है।

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पूजा में फूलों का महत्व

लेकिन फूलों का पूजा में क्या महत्व है? दरअसल हिन्दू मान्यताओं में भगवान की पूजा को बेहद पवित्रता से करना चाहिए। उनकी पूजा के लिए प्राकृतिक चीज़ें ही उपयोग हों, इस बात का खास ख्याल रखा जाता है। इसी बात का ध्यान रखते हुए हर एक वस्तु पवित्र एवं स्वच्छ हो, यह आवश्यक है।  जैसा की अपने देखा होगा लक्ष्मी   जी कमल पर बिराजमान होती है , इसलिए उनको पद्मासनी भी कहा जाता है .  लक्ष्मी  जी को कमल का फूल या पौधा बहुत ही प्रिय है . जिस घर मे लक्ष्मी कमल और विष्णु कमल का पौधा होता है वह लक्ष्मी जी अपना वरदान जरूर देती है . लक्ष्मी जी का वरदान यानि की धन समृद्धि की बरसात उस घर में होती रहती है. ये पौधा वास्तु दोष भी दूर करता है , और पॉजिटिव एनर्जी का संचार करता है .

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प्रत्येक सामग्री का वर्णन

पूजा में इस्तेमाल होने वाला घी शुद्ध हो, घी को पीतल के पात्र में ही रखा जाना चाहिए क्योंकि वैज्ञानिक संदर्भ से भी पीतल सबसे शुद्ध धातु माना जाता है। इसके अलावा उपयोग होने वाला चरणामृत शुद्ध दूध से बनाया गया हो, भगवान की पूजा की प्रत्येक सामग्री सही मात्रा में हो तथा साथ ही सजावट के लिए प्राकृतिक फूलों का होना ही सही माना जाता है।

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विभिन्न देवों के लिए भिन्न-भिन्न फूल

परन्तु क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि हिन्दू देवी-देवताओं में से प्रत्येक देव के लिए अलग-अलग फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। किसी एक देव की पूजा के लिए यदि कमल का फूल इस्तेमाल में लाया जा रहा है, तो ऐसा जरूरी नहीं कि सभी देवी-देवताओं की पूजा में यही फूल इस्तेमाल होगा।  इसी क्रम में लक्ष्मी जी को भी सबसे प्रिय पौधा और फूल है लक्ष्मी कमल और विष्णु कमल का पौधा . इसे घर में जरूर होना चाहिए . ये एक इंडोर पौधा है पर कभी कभी सप्ताह में १ बार धुप में जरूर रखना चाहिए.

 

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क्या है इसका कारण?

फूलों को बदलने के पीछे कुछ कारण छिपे हैं। लेकिन  लक्ष्मी कमल के फूल और पोधे की काफी महत्ता पाई गई है। यह फूल पवित्र है, पूजा के लिए योग्य है तथा भगवान का प्रिय फूल माना जाता है। इस फूल की सबसे खास बात यह है कि यह किसी भी प्रकार के तापमान, चाहे वह बर्फीली पहाड़ियों में हो या फिर रेगिस्तान की तपती गर्मी हो, किसी भी प्रकार के तापमान में उपजने के योग्य होता है।

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कमल का फूल और पोधा

और इन फूलों से भरा हुआ तालाब देखना दुनिया का सबसे खूबसूरत दृश्य माना जाता है। भले ही यह फूल साफ पानी में नहीं पनपता, लेकिन इस फूल की पंखुड़ियां उस पानी से कभी रिश्ता नहीं बनातीं। यह पंखुड़ियां हमेशा ही पानी की सतह से 1 से 8 इंच की ऊंचाईं पर ही होती हैं। और इन फूलों से भरा हुआ तालाब देखना दुनिया का सबसे खूबसूरत दृश्य माना जाता है। भले ही यह फूल साफ पानी में नहीं पनपता, लेकिन इस फूल की पंखुड़ियां उस पानी से कभी रिश्ता नहीं बनातीं। यह पंखुड़ियां हमेशा ही पानी की सतह से 1 से 8 इंच की ऊंचाईं पर ही होती हैं। लेकिन कमल का फूल का पौधा घर में लगाना संभव नहीं होता है . इसलिए लक्ष्मी जी और विष्णु भगवन को प्रशन्न करने का सबसे अच्छा उपाय है घर में लक्ष्मी कमल हुए विष्णु कमल का पौधा जोड़ी में लगाए .

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सबसे प्रिय पुष्प

हिन्दू धर्म में कमल के फूल को सबसे प्रिय माना जाता है। यह केवल पवित्रता का प्रतीक नहीं है, वरन् मनुष्य जाति के लिए ज़िंदगी, प्रजनन तथा खुशियों का प्रतीक माना जाता है। स्वयं हिन्दू धर्म की धन की देवी मां लक्ष्मी जी इस पवित्र पुष्प पर विराजमान पाई गई हैं।

लेकिन कमल का फूल का पौधा घर में लगाना संभव नहीं होता है . इसलिए लक्ष्मी जी और विष्णु भगवन को प्रशन्न करने का सबसे अच्छा उपाय है घर में लक्ष्मी कमल हुए विष्णु कमल का पौधा जोड़ी में लगाए .

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लक्ष्मी पूजन के लिए खास बना है

इसलिए भक्त सबसे अधिक इस फूल का इस्तेमाल लक्ष्मी पूजन के लिए ही करते हैं। महाभारत में उल्लेखनीय एक कथा के अनुसार लक्ष्मी जी एक कमल के फूल से ही प्रकट हुई थीं, और यह पुष्प भगवान विष्णु के सिर से निकला था। इस मान्यता के आधार पर ही आज भक्त लक्ष्मी पूजन करते समय मां के चरणों में 108 पुष्पों की माला अर्पित करते हैं।

लेकिन कमल का फूल का पौधा घर में लगाना संभव नहीं होता है . इसलिए लक्ष्मी जी और विष्णु भगवन को प्रशन्न करने का सबसे अच्छा उपाय है घर में लक्ष्मी कमल हुए विष्णु कमल का पौधा जोड़ी में लगाए .

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दुर्गा एवं लक्ष्मी के लिए

इसके अलावा यह पुष्प अन्य देवियों को जैसे कि दीपावली पर मां लक्ष्मी तथा दुर्गा पूजन में मां दुर्गा के साथ महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को भी अर्पित किया जाता है। यह पौराणिक मान्यताएं ही हैं जो कमल का फूल किसी विशेष भगवान को अर्पित किया जाता है।

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जानें किसे है क्या पसंद

इस पुष्प का संबंध किसी के भगवान के साथ आमतौर पर पौराणिक तस्वीरों से ही देखा जा सकता है, जब भगवान स्वयं अपने हाथ में कमल का पुष्प धारण किये हुए होते हैं। परन्तु कमल पुष्प के अलावा अन्य कई ऐसे फूल हैं जो विभिन्न देवी-देवताओं के पूजन की सामग्री का हिस्सा बनकर पूजा को और भी फलदायी बनाते हैं।

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भगवान विष्णु

उदाहरण के लिए सृष्टि के पालनहार विष्णुजी के संदर्भ से ऐसा माना गया है कि उन्हें मनमोहक चीज़ें बहुत पसंद आती हैं। वे संगीत के प्रेमी हैं तथा खुशबूदार पुष्पों से उनकी पूजा करना अधिक फलदायी माना गया है। इसलिए उनके पूजन के लिए मोगरा तथा बेला के पुष्प का ही इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा कई बार भक्त उन्हें तुलसी के पत्तों से भी प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। बहुत ही कम लोगो को जानकारी होती है की विष्णु कमल का पौधा भी होता है .  और ये बात भी बहुत काम ही लोग जानते है की जहा लक्ष्मीपति  विष्णु कमल का पौधा होता है वह लक्ष्मी जी जरूर निवास करती है .  इसलिए विष्णु भगवान को  विष्णु कमल का पौधा अर्पित  किया जाता है  .

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खुशबूदार फूल

पालनहार के बाद सृष्टि पर बुरा समय आने पर पापियों का सर्वनाश करने वाले भगवान शिव के रौद्र रूप की तरह ही उनकी फूलों की पसंद को भी काफी कठोर पाया गया है। कैलाश पर्वत पर जहां पुष्प के स्थान पर जंगली पौधे ज्यादा पाए जाते हैं, ऐसे में भगवान शिव को भक्त खुशबूदार फूल अर्पित नहीं करते।

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भगवान शिव

इसके स्थान पर उन्हें उसी रंग के फूल अर्पित करना सही माना जाता है जो उनके समक्ष कैलाश पर्वत की तस्वीर जाहिर करें। आसमानी रंग के फूलों से शिव की स्तुति करना लाभकारी माना जाता है। ‘एकोंदो’ नामक एक ऐसा ही फूल है जिसका रंग आकाश से काफी मिलता है, लेकिन यह काफी कम पाया जाता है।

 

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लक्ष्मीजी को यह भी है पसंद

पिछली स्लाइड्स में जैसा कि बताया गया था कि मां लक्ष्मी को कमल के ही फूल अर्पित किए जाते हैं, लेकिन इसके अलावा भक्त उनकी आराधना करते समय कमल के पुष्प के स्थान पर अन्य फूल भी इस्तेमाल करते हैं। जैसे कि गुलाब के फूल, फिर चाहे वह गहरे लाल रंग के हों या गुलाबी। बहुत ही कम लोगो को जानकारी होती है की विष्णु कमल का पौधा भी होता है .  और ये बात भी बहुत काम ही लोग जानते है की जहा लक्ष्मीपति  विष्णु कमल का पौधा होता है वह लक्ष्मी जी जरूर निवास करती है .  इसलिए विष्णु भगवान को  विष्णु कमल का पौधा अर्पित  किया जाता है  .  विष्णु कमल के पौधे का रंग डार्क ब्रॉन लालिमा लिए हुए होता है ये पौधा  लक्ष्मी जी को बहुत प्रिय होता है

 

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कभी ना अर्पित करें सफेद फूल

मां लक्ष्मी को लाल रंग के फूल अर्पित करने के पीछे एक आध्यात्मिक कारण छिपा है। कहते हैं कि हिन्दू मान्यताओं में सफेद रंग को एक विधवा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए कभी भी किसी देवी को सफेद फूल अर्पित नहीं करने चाहिए। वरन् उन्हें ‘सुहागन’ की निशानी अर्पित करते हुए लाल रंग के पुष्प ही चढ़ाएं।

 

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सरस्वती एवं पार्वती जी

इसलिए मां लक्ष्मी, दुर्गा तथा अन्य देवी जैसे कि सरस्वती एवं पार्वती जी के पूजन के लिए लाल रंग के पुष्प देना शुभ माना जाता है। शक्ति का स्रोत देवियों के अलावा शिव के पुत्र गणेश को भी खास प्रकार के फूल चढ़ाने की मान्यता प्रचलित है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

LAXMI KAMAL & VISHNU KAMAL

The Plant LAXMIKAMAL & VISHNU KAMAL   that which you are seeing is a very miraculous plant.

In planting this plant with the Vidhi- Vidhan  in the house, you will surely get a special result which will remove the obstruction caused by your wealth and the new dimension of wealth for you will open .

If money does not sustain  in your home, then it will also help to sustain money at your home or business .

Shortly after applying this plant, you will feel that money has started coming to your house and to pave new and new paths of earning money will start.

By applying this plant, Vastu defect is removed from the house. If you are troubled by somebody’s court case, then plant the Aparajita plant with LAXMIKAML Plant.

Place this plant in the north east direction i.e., or near the place of worship, within a few days or the plantIng this plant will start showing the effect its  does not provide money, but also maintains peace and prosperity in the house. is .

By applying this plant, your problems related to money are solved because in it Laxmi ji lives.

 

The Laxmi Lotus and Vishnu Lotus  Plants, Hindu God’s Favorite Plants.

Both in worship and in portrayals of the divine, Hindus are infatuated with Laxmi  lotus Plants. The very name of the Hindu worship ritual, puja, can be translated as “flower act.”

The lotus is the foremost symbol of beauty, prosperity and fertility. According to Hinduism, within each human is the spirit of the sacred lotus. It represents eternity, purity, divinity, and is widely used as a symbol of life, fertility, ever-renewing youth. The Laxmi  lotus Plants  is used to describe feminine beauty, especially female eyes.

One of the most common metaphysical analogies compares the lotus’ perennial rise to faultless beauty from a miry environment to the evolution of consciousness, from instinctive impulses to spiritual liberation.

In the Bhagavad Gita, a human is adjured to be like the lotus; they should work without attachment, dedicating their actions to God, untouched by sin like water on a lotus leaf, like a beautiful  lotus Plants  standing high above the mud and water.

In the postures of hatha yoga, the lotus position, padmasana, is adopted by those striving to reach the highest level of consciousness, which itself is found in the thousand-petalled lotus chakra at the top of the head.

For Buddhists, the Laxmi  lotus Plants  symbolizes the most exalted state of human; head held high, pure and undefiled in the sun, feet rooted in the world of experience.

There is a story that the lotus arose from the navel of God Vishnu, and at the center of the flower sat Brahma. Brahma (the Creator), Vishnu (the Protector) and Siva (the Merger) are associated with this plant. There are also accounts of the world born through a “Golden Lotus” and Padmakalpa, the Lotus Age in the Padmapurana (678 ce).

“Hindu texts describe that water represents the procreative aspect of the Absolute, and the Laxmi & Vishnu  lotus Plants  , the generative.”

Trilok Chandra Majupuria of Tribhuvan University, Kathmandu, explains in Religious and Useful Plants of Nepal and India (1989, M. Gupta, Lashkar, India): “The Taittiriya Brahmana describes how Prajapati, desiring to evolve the universe, which was then fluid, saw a lotus-leaf, pushkara parna, coming out of water. It is described that when divine life-substance was about to put forth the universe, the cosmic waters grew a thousand-petalled lotus flower of pure gold, radiant like the sun. This was considered to be a doorway, or an opening of the mouth of the womb of the universe. Hindu texts describe that water represents the procreative aspect of the Absolute, and the cosmic lotus, the generative. Thus, lotus is the first product of the creative principle.” The role of Lord Brahma was to re-create the universe after the great flood on this planet. In order to create the universe, He used the different parts of the lotus plant.

Goddess Lakshmi, patron of wealth and good fortune, sits on a fully bloomed pink lotus as Her divine seat and holds a lotus in Her right hand. It is also mentioned in the Mahabharata that Lakshmi emerged from a lotus which grew from the forehead of Lord Vishnu, and a garland of 108 lotus seeds is today used for the worship of Lakshmi.

The Goddess of Power, Durga, was created by Lord Siva to fight demons and was adorned with a garland of lotus flowers by Varuna.

Goddess of Wisdom, Saraswati is associated with the white Lotus. Virtually every God and Goddess of Hinduism; Brahma, Vishnu, Siva, Lakshmi, Saraswati, Parvati, Durga, Agni, Ganesha, Rama and Surya; are typically shown sitting on the lotus, often holding a lotus flower in their hand. The lotus which serves thus as the seat of the Deity, signifying their divinity and purity, is called padmasana or kamalasana.

“Visualize within yourself a lotus, centered right within your heart.”

Hindu scriptures say that the Atman dwells in the lotus within the heart. Visualize within yourself a lotus, centered right within your heart. Try to mentally feel and see the heart as a lotus flower right within you. Within the center of the lotus, see a small light. Hindu scriptures state that the Atman within the heart looks like a brilliant light about the size of your thumb, just a small light. This light is an emanation of your radiant being. It is dwelling right within. The Self God is deeper than that. The lotus is within the heart, and the Self God dwells deep within that lotus of light.